ऐतरेयब्राह्मण के शनु शेप उपाख्यान की अंतर्कथा

Kahani

भारतीय परंपरा के ग्रंथों में  ऐतरेयब्राह्मण एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है.इसके शनु शेप उपाख्यान के अंतर्गत एक गीत और उसकी अंतर्कथा  का वर्णन मिलता है।चरैवेति-चरैवेति  शीर्षक इस गीत की अंतर्कथा बड़ी रोचक है।यह कथा आरम्भ होती है कि राजा हरिश्चंद्र के कोई पुत्र नहीं था।उन्होंने पर्वत तथा नारद नामक ऋषियों से पुत्र-प्राप्ति का उपाय पूछा।ऋषियों ने राजा को वरुण देवता की उपासना का मार्ग सुझाया।राजा हरिश्चंद्र ने वरुण देव से पुत्र-प्राप्ति की प्रार्थना की और साथ ही साथ वरुण को यह वचन भी दिया कि उनकी (वरुण की)कृपा से उन्हें(हरिश्चंद्र को ) जो पुत्र प्राप्त होगा उससे ही वे वरुण देव का यजन करेंगे।वरुण ने तथास्तु कहकर राजा की कामना को फलीभूत कर दिया।हरिश्चंद्र एक पुत्र के पिता बने। उन्होंने अपने पुत्र का नाम रोहित रखा। वरुण देव राजा के पास आए,उन्होंने राजा को उनके दिए वचन की याद दिलाई और भेंट-स्वरूप राजा से उनका पुत्र माँगा।

हरिश्चंद्र  ने वरुण से कहा कि मेरा पुत्र तो अभी दस दिन का भी नहीं हुआ,यह तो अभी पशु है;दस दिन का होकर यज्ञीय हो जाए फिर इसे आपको दे दूंगा।वरुण चले गए ,दस दिन बीतने पर पुनः लौटकर उन्होंने हरिश्चंद से रोहित को माँगा।हरिश्चंद्र ने वरुण से कहा-अभी इसके दांत नहीं निकले, दांत निकलने पर मेध्य हो जाएगा फिर मैं आपको इसे दे दूँगा।वरुण ने इस पर भी अपनी स्वीकृति दे दी।दांतों के निकल जाने पर वरुण एक बार पुनः हरिश्चंद्र के पास आए।उन्होंने हरिश्चंद्र से फिर रोहित को माँगा।इस बार हरिश्चंद्र ने कहा कि जब तक दूध के दांत नहीं गिर जाते तब तक मनुष्य पशु ही होता है इसलिए दूध के दांत गिर जाने के बाद इसका यजन आपको कर दूँगा।वरुण राजा की यह बात भी मान गए।दूध के दांत गिर जाने के बाद वरुण लौटे, राजा ने उनसे नए दांत निकलने  पर मेध्य होने की बात कही।वरुण इस बार भी खाली हाथ लौटे। ऐसा प्रतीत होता था जैसे वरुण ने ठान लिया था कि वे रोहित को लेकर ही मानेंगे और हरिश्चंद्र ने निश्चय कर लिया था कि वे किसी भी दशा में रोहित को वरुण को नहीं देंगे।इस अंतर्द्वंद्व में कुछ दिन बीते,पुनः हरिश्चंद्र के यहाँ वरुण का आगमन हुआ।

वरुण ने हरिश्चंद्र से रोहित का यजन-दान माँगा।हरिश्चंद्र ने वरुण से कहा-देव!मेरा पुत्र क्षत्रिय कुलोत्पन्न है,और आप तो जानते ही हैं क्षत्रिय जब तक कवच न धारण कर ले तब तक वह किसी कार्य के लिए योग्य नहीं होता।आप अधीर न हों, जैसे ही यह कवच पहनने लगेगा मैं आप के लिए इसका यजन कर दूँगा।वरुण राजा की बातों से ऊब गए थे परंतु उन्होंने अगली बार आने की स्वीकृति दी और विदा हुए।रोहित के कवचधारी क्षत्रिय हो जाने पर जब वरुण ने पुनः राजा हरिश्चंद्र से रोहित को माँगा तो इस बार राजा ने कुछ आगे की चाल चली।उन्होंने वरुण को अगले दिन बुलाया और रात्रि में ही अपने पुत्र से मंत्रणा कर उसे वन में भगा दिया।राजा के कथनानुसार जब वरुण अगले दिन पहुँचे तो राजा ने उनसे अपने पुत्र के कहीं भाग जाने की बात कही।अब तो  राजा पर वरुण का कुपित होना स्वाभाविक ही था।वरुण के कुपित होने के कारण राजा हरिश्चंद्र को जलोदर हो गया।पिता के कष्ट का समाचार पाकर जंगल से घर की ओर लौटते रोहित को पथभ्रमित करने और घर न पहुँचने देने के लिए इंद्र ने पुरुष का वेश बनाकर एक संचरण गीत के माध्यम से वन में ही पांच वर्षों तक भटकाया और घर नहीं पहुँचने दिया।यह गीत चरैवेति-चरैवेति(चलते रहो,चलते रहो)के रूप में विख्यात हुआ।इसमें इंद्र ने रोहित से कहा-श्रम से जो नहीं थका उसे लक्ष्मी नहीं  प्राप्त होती बैठे रहने वाले का सौभाग्य सो जाता है चलता हुआ मनुष्य मधु प्राप्त करता है इस लिए चलते रहो…वास्तव में इंद्र ने तो यह सब रोहित को भटकाने के लिए कहा पर  इंद्र द्वारा भटकाने के लिए कही गई ये बातें भी आज हमारे जीवन को उन्नति के पथ पर अग्रसर करने में सहायक हैं और इन तथा इन जैसी असंख्य बातों को समाहित करने वाले हमारे प्राचीन ग्रंथों को विश्वकी ज्ञान-निधि का अमूल्य रत्न बनाती हैं।

 

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